उम्र का खेल...!
यहाँ उम्र के खेल में हार जाता है,
धरा का वो चोला उतार जाता है....!
हकीकत क्या इसकी कोई न जाने,
धुरंधर भी इस खाक पर हार जाता है....!
न जाने ये कब से है आबाद दुनिया,
लगाकर इसे खुद उखाड़ जाता है....!
है आधा फ़साना और आगे अंधेरा,
महल आज के वो उजाड़ जाता है....!
हज़ारों पटकथाएँ हज़ारों ही ये मंच,
वो पल में ही रिश्ते बिसार जाता है....!
बना किस्से और कहानियों का हिस्सा,
वो अपना ही किरदार निखार जाता है....!
लगाकर यहाँ दौलत के वो अंबार,
वो खाली ही हाथ अपने पसार जाता है....!
न हारी कभी मौत, आती समय पर,
समय सबको आख़िर पछाड़ जाता है....!
ये खेल है सारा बस इक ख़ुदी का,
मुसाफिर यहाँ से सिधार जाता है....!
भले जीत ले सारी दुनिया तू 'मान',
कि आख़िर में सब कुछ हार जाता है....!
मानसिंह सुथार©️®️
मानसरोवर साहित्य अकादमी, राजस्थान


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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