(बाल कविता)
कितनी लम्बी बनी सड़क
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घर से निकला मिली सड़क ।
कितनी लम्बी बनी सड़क ।।
रिक्शा ठेला दौड़ें दिन भर
मोटर गाड़ी रौंदें दिन भर
कष्ट बहुत सहती है लेकिन
उफ् न करती कभी सड़क ।
कितनी लम्बी बनी सड़क ।।
गाँव-शहर हर घर तक फैली
कभी-कभी हो जाती मैली
खेत और खलिहानों में भी
छोटी मोटी बड़ी सड़क ।
कितनी लम्बी बनी सड़क ।।
चलें किनारे पैदल वाले
धीरे-धीरे मंजिल पा लें
कई नाम से जानी जाती
गलियारा व गली सड़क ।
कितनी लम्बी बनी सड़क ।।
हल्के-भारी वाहन चलते
धन्यवाद सड़कों को कहते
दाएँ-बाएँ टेढ़ी-मेढ़ी
इधर-उधर भी मुड़ी सड़क।
कितनी लम्बी बनी सड़क ।।
भेद-भाव न नफरत करती
देख किसी को कभी न जलती
सबको सदा बढ़ाने वाली
धूप-छाँव में पली सड़क ।
कितनी लम्बी बनी सड़क ।।
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~राम नरेश उज्ज्वल


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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