स्वर्ण किरण नहलाएं मन को
बंद नयन में छवि पिया की
कैसे मन में धीर धरूं
कुछ तो तुम बतलाओ सखी
मदमयी मीठी गंध पलाश की
खींचे मन को घड़ी घड़ी
स्वयं की कैसे पीर हरूं
आओ तुम समझाओ सखी
महकी आम की डाली डाली
कुहू कुहू में प्रणय की प्यास
विव्हल नयन में नीर भरूं
तड़पन कुछ मिटलाओ सखी
कह दो ना जाकर बुलबुल से
बंद करें अब प्रेम राग
नहीं तो अब मैं गिर मरूं
हिम्मत तो दिखलाओ सखी
कितनों ही चाहे काम पड़े अब
उनको विदेश न जाने दूं
जैसी चाहे तदबीर करूं
मन को धीर धराओ सखी
अब की बरस के बसंत में
बावली सी हो बैरागन, क्या
केसरिया रंग चीर धरूं
कुछ तो तुम झुठलाओ सखी।।
सर्वाधिकार अधीन है


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







