"ज़िन्दगी का राज़ किसने पाया है"
कभी धूप कभी छाया है,
कभी सत्य तो कभी माया है,
बीत रही इस ज़िन्दगी का,
राज़ किसने पाया है।
कभी आस कभी विश्वास है,
ख़ुशदिल है कभी उदास है,
महफ़िलों में नज़र नहीं आती,
तन्हाई में दुश्मन जैसे पास है।
कभी हँसाया है इसने जी भर कर हमें,
और कभी जी भरकर रुलाया है,
बीत रही इस ज़िन्दगी का,
राज़ किसने पाया है।
किसी के लिए सरताज है ये ज़िन्दगी,
कभी दो वक़्त की रोटी की मोहताज है,
कोई रो-रो कर निकाल रहा है आंसु,
किसी के लिए एक बिंदास अंदाज है ज़िन्दगी।
कोई ठोकरों से टूट गया है देखो,
किसी ने दूसरों की ज़िन्दगी को सजाया है,
इस बीत रही ज़िन्दगी का,
राज़ किसने पाया है।
कभी बादल तो कभी बिजली है,
कभी सन्नाटा तो कभी तूफ़ानों की हिचकी है,
हर मौसम में ढलती ये,
ज़िन्दगी का राज़ किसने पाया है।
कभी काँटे तो कभी फूल है,
कभी मिलन तो कभी जुदाई का शूल है,
हर दिन एक नई कहानी ज़िन्दगी,
इस बीत रही ज़िन्दगी का
राज़ किसने पाया है।
कभी मंज़िल तो कभी रास्ता है,
कभी साया तो कभी खुद से ही वास्ता है,
हर कदम पर उलझी ये ज़िन्दगी का,
राज़ किसने पाया है।
न समझ पाया कोई आज तक इसे,
न सुलझा पाया ये पहेली ज़िन्दगी,
जो जी गया वो ही सिकंदर कहलाया,
इस बीत रही ज़िन्दगी,
का राज़ किसने पाया है।
रचनाकार- पल्लवी श्रीवास्तव
ममरखा, अरेराज, पूर्वी चम्पारण (बिहार)


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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