एक कहानी सुनाऊं....चलो आज एक कहानी सुनाती हूँ।
गुरुवार का दिन बहुत ही खास दिन था। मन सुबह थोड़ा परेशान था पर कुछ समय बाद ठीक हो गया। तारीख१६ थी। उस खास दिन मेरे कुछ दोस्त आने वाले थे। वो बस बोल रहे थे आयेंगे करके पर उन लोगों ने तय नहीं किया था आज ही आयेंगे। मेरी बात मेरे दोस्त से हुआ था। उसने कहा कि आज आ सकते हैं इतना बोले और चलें गये। जब उन लोगों का मेरे पास आना तय हुआ उन्होंने मुझे नहीं बताया कि हम आ रहे हैं। बस कुछ ही दूरी बची थी मेरे घर आने के लिए तब उनका मैसेज आया। और कहा खाना बनाके रखो हम आ रहे हैं। मैंने पूछा-सच में आ रहे हो या मज़ाक कर रहे हो। उन्होंने फिर कहा नहीं..हम नहीं आ रहे हैं।फिर मैंने उन्हें फोन किया मोबाइल की घंटी बजी और उन्होंने फोन उठाया फिर मैंने पूछा आ रहे हो या नहीं तब बोले कि आ रहे हैं। सुनके सांसे थम सी गई। थोड़ा घबराई और हड़बड़ाहट में काम करने लगी। वो लोग मेरे घर और मेरे पास पहली बार आ रहे थे। वो जितना नज़दीक आते गए मेरी दिल की धड़कने तेजी से बढ़ने लगी, हाथ-पैर कांपने लगे। बाकी का रास्ता उन लोगों ने खुद तय किया थोड़ा सा बचा हुआ रास्ता जो मेरे घर तक आती है उसको मैंने बताया। जैसे ही वो घर पहुंचे मुझे यकीन नहीं हो रहा था कि मेरे सामने हैं, मुझे देख रहे है और मैं उन्हें। घर के अंदर आए और हाथ मिलाए मुझसे और गले से लगाए। उसमें से एक शख्स था जिससे मैं हाथ नहीं मिलाई थी पर उसके साथ में जो आए थे उन्होंने कहा हाथ तो मिलाओ यार...। फिर मैं उससे हाथ मिलाई। मन तो उसे भी गले लगाने का था पर हाथ मिलाई। अगर कोई बहुत इंतजार के बाद मिले तो सिर्फ हाथ मिलाके काम चलाना बहुत मुश्किल होता है। पर मैंने उससे हाथ मिलाके काम चलाए। उसके बाद उनको चाय पिलाई, खाना खिलाई, घर घुमाई और छोटे से गार्डन में भी घुमाया। थोड़ा सा वक्त था पर यादें बहुत सारी समेट लिए थे। कोई अपना हो और उसे हम छू भी न पाए तब तो बुरा लगता ही है। बस उस पल को याद करती हूँ और मन ही मन मुस्कुराती रहती हूँ। काश ऐसा दिन एक बार और आए और मैं उससे मिलूं इस बार हाथ नहीं गले से लगाऊं....।।
- सुप्रिया साहू


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