
- पल्लवी श्रीवास्तव - कविता शीर्षक "होली"होली का आशय
सीमा के पहरेदारों से पूछो
बंदूकों की पिचकारी से
जहां निकलती गोली है।
जो मन में उत्पात मचा दे
बात न ऐसी तुम बोलो
सारी भाषाओं पर भारी
एक प्रेम की बोली है।
चलो हम रंग खेलते है,
बसंत ऋतु में फाल्गुन माह में
होलिका जली मची खलबली,
बचा प्रह्लाद
सत्य की जीत होली खेलते हैं ।
होली का त्योहार आया,
खुशियों की सौगात लाया
रंगों की उड़ान लाया,
होली का त्योहार आया।
होली में सभी के
गम, क्रोध, इर्ष्या, लालच..
होलिका के तरह जल कर भस्म हो जाए,
सभी के दिलों में केवल प्यार ही प्यार हो।
चलों आज हम वर्षों पुरानी,
अपनी दुश्मनी भुला दें..
कई होलियां सुखी गुजर गई
इस होली पर आपस में रंग लगा लें।
-पल्लवी श्रीवास्तव
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