चैत्रे मासे जगद्ब्रह्मा ससर्जा प्रथमे हनी।
शुक्ल पक्षे समग्रे तु तदा सूर्योदये सती।।
एक अरब छांनवे करोड़ अरु बरिस आठ था लाख।
तिरपन हजार इक सौ सत्ताइस बरिस पूर्व अस भाष।।
चैत्र मास तिथि रही प्रतिपदा और शुक्ल रहा था पाख।
सृष्टि सृजनकर्ता रच दी थी कहि सत्य सनातन शाख ।।
चैत्र शुक्ल प्रतिपदा पुनीत तिथि का इतिहास पुराना।
महिप विक्रमादित्य राज शक भू पर हुआ हराना।।
वराह मिहिर उस कालखंड के सिध्द ज्योतिषाचार्य रहे।
तिन्हके योगदान से विक्रम संवत्सर सँवरे कार्य रहे।।
इस प्रकार हम सृष्टि सृजन का उत्सव वर्ष मनाते हैं।
दुनिया सम्मुख तथ्य सनातन दर्शन दिव्य कराते हैं।।
जिसका स्वागत हित उतरी है प्रकृति नया परिधान सजे।
त्रिविध बयारी मस्त मगन होइ कोकिल करती गान मजे।।
दशों दिशाएँ महक रहीं हैं जगत नया अरमान लिये।
तरह तरह के सुमन सुगंधित अर्पित हैं सम्मान लिये।।
वह अमराई मस्त हवाएं प्रकृति आज मदहोश किये।
आज प्रफुल्लित प्रकृति मग्न नववर्ष सुबह उद्घोष किये।।
तेज भरे मार्तण्ड प्रभा लखि उनका करता वन्दन।
नये वर्ष पर पुष्प सहित लोटे जल ले चन्दन।।
इस पावन पल पर मेरा है जन जन का अभिनन्दन।
भारत माता गति विकास लै प्रगति करे चढ़ि स्यन्दन।।
नये वर्ष की सुबह नई है नये दिवस की किरण नई।
नये सृजन की करें कल्पना भारत माँ की दृश्य नई।।
हो कल्याण जगत सचराचर सुख का जन जन भागी।
गगन चूमता ध्वज भगवा अब धर्म सनातन जागी।।
जन जन में सदबुद्धि शारदा विद्या वारिधि दाता।
तीक्ष्ण बुध्दि सदबुद्धि बदलकर भर दें बुद्धि विधाता।।
देशभक्ति हिय भरी जनों में राष्ट्रप्रेम की धारा।
कर्मभक्ति में डूब रहें सब भटकें न आवारा।।
गैवीनाथ मिश्र शाहपुर
रीवा
9200981625


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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