।।नारी दिवस।।
भला बताओ बिन नारी का क्या दर्शन संसार हुआ,
नारी ही तो स्वयं शक्ति की धरती में अवतार हुआ।
बाम भाग पर भई समाहित पति बनता भुजचारी है,
नारायण का रूप बनाती बनता तब जगधारी है।।1।।
जिस समाज में नारी का होता ऊँचा स्थान रहा,
बिबुध रमा करते उस भू पर होता तीर्थ समान रहा।
नारी जहां उपेक्षित होती निष्फल होते काज वहाँ,
कुल मर्यादा गई रसातल निर्बल होती लाज जहाँ।।2।।
नारी ही तो सावित्री थीं जो यमराज हरायी थीं,
सत्यवान की आयु जीतकर पुनः उन्हें लौटायी थी।
नारी ही तो मां सीता थीं श्रीराम को सदा अजेय किया,
नारी ही थीं मां अनसुइया तपबल दत्तात्रेय किया।।3।।
नारी वह जो उच्च कर्म से दोनों कुल का नाम करे,
पिता और पति मर्यादा हित दोनों कुल का ध्यान करे।
दोनों कुल के गर्व करें बँधती ऐसी मर्यादा हो,
जो पदचिह्न प्रमाण बनें मानों माधव की राधा हो।।4।।
नारी वह है अपने पति के नित जीवन को सफल किया,
उठे हुए जीवन प्रश्नों को समय समय हल कुशल किया।
तूफानों में फँसी नाव जब स्वयं हाँथ पतवार लिया,
युद्धभूमि में साथ दिखीं रथ चक्र कील का काम किया।।5।।
नारी ही तो दुर्गा थी नारी काली विकराल रहीं,
जीवन के संग्रामभूमि में हर विपदा की ढाल रहीं।
मां बहन बेटियाँ पत्नी पावन नारी का ही रूप रहीं,
खड़ीं मिली इक पाँव छाँव बनि चाहे कितनी धूप रही।।6।।
पन्ना त्याग समर्पण अनुपम नारी का इतिहास रहा,
स्वयं लाज हित पद्मिनियों का जौहर नारी खास रहा।
दत्तक सुत को पीठ बांधकर गोरों को ललकार रहीं,
कंगन चूड़ी त्यागि हाँथ में बरछी ढाल तलवार गहीं।।7।।
कभी चेनम्मा दुर्गा बनकर अंग्रेजों से खूब लड़ीं,
कभी अहिल्या बाई आकर रचतीं हैं इतिहास बड़ी।
कभी कल्पना अंतरिक्ष में विजय पताका फहरातीं,
कभी लता संगीत सप्त स्वर कोकिल कण्ठ सुना जातीं ।।8।।
गैवीनाथ मिश्रा शाहपुर
रीवा


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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