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मैथिलीशरण गुप्त (3 अगस्त 1886 - 12 दिसंबर 1964) हिंदी के राष्ट्रकवि थे, जिनका जन्म झाँसी के चिरगाँव में हुआ और जिन्होंने खड़ी बोली को काव्यभाषा के रूप में स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, 'भारत-भारती' जैसी रचनाओं से राष्ट्रीय चेतना जगाई और 'दद्दा' के नाम से लोकप्रिय हुए, जिन्हें महात्मा गांधी ने 'राष्ट्रकवि' कहा और पद्म भूषण से सम्मानित किया गया।
प्रमुख रचनाएँ:
'साकेत' (सर्वोच्च शिखर), 'यशोधरा', 'जयद्रथ वध', 'द्वापर', 'भारत-भारती' आदि (2 महाकाव्य, 20 खंडकाव्य, 17 गीतिकाव्य, 4 नाटक)।
काव्य की विशेषताएँ:
पवित्रता, नैतिकता, मानवीय सम्बन्धों का महत्व, राष्ट्रीयता और सांस्कृतिक मूल्यों का समावेश।
मैथिलीशरण गुप्त ने अपनी कविताओं में देश के अतीत, वर्तमान और भविष्य को चित्रित किया और भारतीय संस्कृति व समाज के आदर्शों को अपनी रचनाओं में जीवंत किया, जिससे वे आधुनिक हिंदी साहित्य के महत्वपूर्ण स्तंभ बन गए।
मेरी भाषा में तोते भी राम राम जब कहते हैं,
मेरे रोम रोम में मानो सुधा-स्रोत तब बहते हैं ।
सब कुछ छूट जाय मैं अपनी भाषा कभी न छोड़ूंगा,
वह मेरी माता है उससे नाता कैसे तोड़ूंगा ।।
-मैथिलीशरण गुप्त
Article by
Admin - Reena Kumari Prajapat 


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