Dastan-E-Shayara By Reena Kumari Prajapat

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The Flower of WordThe Flower of Word by Vedvyas Mishra
The Flower of WordThe novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas MishraThe Flower of Word by Vedvyas Mishra
Dastan-E-Shayara By Reena Kumari Prajapat

Dastan-E-Shayara By Reena Kumari Prajapat

The novel 'Nevla' (The Mongoose), written by Vedvyas Mishra, presents a fierce character—Mangus Mama (Uncle Mongoose)—to highlight that the root cause of crime lies in the lack of willpower to properly uphold moral, judicial, and political systems...The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra

कविता की खुँटी

                    

"🪔 दीपावली : आलोक का महापर्व 🪔"

"🪔 दीपावली : आलोक का महापर्व 🪔"

जब अमावस की निशा में,
दीप मुस्काते हैं।
तब धरा के कण-कण में,
स्वप्न जग जाते हैं।
ज्योति की कोमल शिखा,
जब तिमिर हरती है।
तब हृदय की बंद वीणा,
प्रेम से बजती है।

आँगन में रंगोली,
अधरों पर मुस्कान।
घर-घर में गूँज उठे,
मंगलमय गान।
दीपों की पंक्तियाँ,
कहती हैं यही बात।
प्रेम से सुंदर नहीं,
कोई भी सौगात।

सजी हुई चौखटें,
महकते हुए द्वार।
खुशियों की दस्तक से,
गूँजे घर-संसार।
माँ के हाथों की मिठास,
अपनों का साथ।
यादों के दीपक जलें,
सज जाए हर रात।

मिट जाए मन का तम,
मिटे वैर-विरोध।
करुणा से सिंचित हो,
जन-जन का अवबोध।
केवल घर ही नहीं,
अंतर्मन भी सजाएँ।
सोए हुए सद्भाव को,
फिर से हम जगाएँ।

नहीं चाहिए वैभव,
न स्वर्णिम उपहार।
अपनों का स्नेह ही है,
जीवन का श्रृंगार।
भूखे के अधरों पर,
भोजन की हँसी हो।
निर्धन की झोपड़ी में,
आशा की ज्योति हो।

जिस घर में रूठे हुए,
रिश्तों की बहार हो।
जहाँ बुजुर्गों के लिए,
सम्मान अपार हो।
जहाँ बच्चों के सपनों को,
मिलता नया आकाश।
ऐसी दीपावली बने,
हर जीवन का प्रकाश।

नन्हें-नन्हें दीपक,
यह संदेश सुनाएँ।
हार के अँधेरों में,
साहस जगमगाएँ।
सत्य की राह पर जो,
निष्ठा से चलता है।
उसके जीवन में ही,
सच्चा दीप जलता है।

तम की काली चादर,
कितनी भी गहरी हो।
आशा की एक किरण,
उससे भी सुनहरी हो।
ठोकर से जो सीखकर,
फिर आगे बढ़ता है।
वही समय की आँधी में,
दीपक-सा जलता है।

राम के वनवास का,
स्मरण कराएँ दीप।
विजय सत्य की हुई,
यह गाथा सुनाएँ दीप।
मर्यादा के पथ पर,
चलने की सीख दें।
अधर्म के हर रूप को,
मिलकर चुनौती दें।

अयोध्या की गलियों में,
जब दीप जले थे।
जन-जन के नयनों में,
आनंद पले थे।
वह केवल लौटने की,
खुशियों का पर्व न था।
वह धर्म और सत्य का,
अमर गौरव-गान था।

लक्ष्मी का वंदन हो,
गणपति का आशीष।
हर जन के जीवन में,
खिले सुखों के पुष्प।
श्रम करने वाले हाथों को,
सम्मान मिले।
हर घर के आँगन में,
खुशियों के फूल खिलें।

किसान के खेतों में,
स्वर्णिम फसलें लहराएँ।
मेहनत करने वालों के,
सपने सच हो जाएँ।
व्यापारी के जीवन में,
ईमान का धन हो।
हर कर्म के पीछे,
सच्चा समर्पण हो।

मजदूर के माथे से,
चिंता की रेखा मिटे।
बेटी के सपनों को,
उड़ने का अवसर मिले।
शिक्षा का दीप जले,
अज्ञान दूर हो।
हर बालक का जीवन,
ज्ञान से भरपूर हो।

प्रकृति की गोद में,
उत्सव ऐसा मनाएँ।
ध्वनि और धुएँ से नहीं,
प्रेम से दीप जलाएँ।
नीले गगन में फिर,
स्वच्छ चाँदनी खिले।
पंछियों के गीतों से,
वन-उपवन भी हिले।

नदियों की निर्मल धारा,
कल-कल करती जाए।
धरती की हरियाली,
फिर से मुस्काए।
फूलों की खुशबू से,
महके हर उपवन।
प्रकृति के संरक्षण में,
लगाएँ अपना मन।

दीपावली का अर्थ,
केवल उत्सव नहीं।
यह दूसरों के दुःख को,
समझने का अवसर सही।
जिस दीप से रोशन हो,
किसी का सूना संसार।
उससे बढ़कर क्या होगा,
पूजा का उपहार?

किसी की आँखों में,
आँसू न रहने पाएँ।
किसी के सपनों पर,
ग़म के बादल न छाएँ।
जिसके जीवन में छाया,
दुःख का घना अँधेरा।
उसके आँगन में भी,
जले दीप सुनहरा।

बाँटें मिठास ऐसी,
मन की कड़वाहट मिटे।
बिछड़े हुए अपनों से,
फिर मिलने की आस जगे।
क्षमा के दो शब्दों से,
कितने घाव भरें।
प्रेम के छोटे प्रयास से,
रिश्ते फिर सँवरें।

आओ, इस दीपावली,
संकल्प नया लें।
रूठे हुए संबंधों को,
फिर से हृदय में लें।
जाति-धर्म के भेदों की,
दीवारें गिराएँ।
मानवता के मंदिर में,
प्रेम के दीप जलाएँ।

मंदिर की घंटी हो,
गिरजाघर की प्रार्थना हो।
गुरुद्वारे की वाणी में,
सेवा का सम्मान हो।
सबके अपने विश्वास,
सबका अपना मान।
प्रेम और सद्भाव से,
महके हिंदुस्तान।

सीमा पर जो प्रहरी,
जागकर रात बिताते।
अपनों से दूर रहकर,
देश की रक्षा निभाते।
उनके नाम भी जलाएँ,
आँगन में एक दीप।
उनके त्याग से ही तो,
सुरक्षित हैं हमारे स्वप्न।

उन माताओं के नाम,
एक दीप जलाएँ।
जिनकी आँखों में सपने,
बच्चों के पलते जाएँ।
उन श्रमिकों के नाम,
एक दीप सजाएँ।
जिनके श्रम से नगरों में,
रोशनियाँ मुस्काएँ।

बूढ़े माता-पिता के,
सूनेपन को हर लें।
उनके अनुभवों की,
मधुर छाँव में ठहरें।
बचपन की किलकारी,
आँगन में गूँज जाए।
हर पीढ़ी का रिश्ता,
फिर से जुड़ता जाए।

मन के भीतर भी,
एक दीप जलाना है।
ईर्ष्या और अहंकार को,
दूर भगाना है।
क्रोध की ज्वाला को,
शीतलता से भरना है।
अपने ही भीतर के,
अंधकार से लड़ना है।

जब लोभ की आँधी में,
संबंध बिखरते हैं।
जब स्वार्थ के कारण,
अपने ही मुकरते हैं।
तब प्रेम का दीपक,
राह दिखाता है।
मानव को मानव से,
फिर मिलवाता है।

नफरत की आँधी में,
दीपक न बुझने पाए।
विश्वास की बाती को,
हर मन सँभाले जाए।
नेकी की बाती जले,
करुणा का प्रकाश फैले।,
सेवा की लौ जले।
हर हृदय में मानवता,
निरंतर फूलती रहे।

बच्चों की हँसी में,
त्योहार सजता है।
बुजुर्गों के आशीष से,
जीवन महकता है।
अपनों के संग बिताए,
पल अनमोल होते हैं।
यही तो जीवन के,
सच्चे धन होते हैं।

दीपक की लौ कहती,
मत हारना कभी।
राहें कठिन हों चाहे,
रुक जाना नहीं कभी।
आँधियों से लड़कर भी,
जो प्रकाश देता है।
वही संसार में अपना,
अस्तित्व रखता है।

हर सुबह नई आशा,
हर शाम नई उमंग।
जीवन के हर मोड़ पर,
बना रहे मधुर रंग।
असफलता के बाद भी,
विश्वास न खोएँ हम।
मेहनत के प्रकाश से,
जीतेंगे हर ग़म।

दीपावली केवल,
दीपों का त्योहार नहीं।
यह आत्मजागरण है,
कोई बाहरी श्रृंगार नहीं।
यह अंधकार पर उजियारे की,
विजयगाथा है।
यह युग-युग से मानवता की,
अमर परिभाषा है।

यह पर्व सिखाता है,
अंतर का तम हरना।
अपने सुख के संग,
औरों के दुःख को समझना।
अपने हिस्से की खुशियाँ,
सबमें बाँटते जाना।
जीवन के हर पथ पर,
नेकी के दीप जलाना।

न धन से बड़ा कोई,
न वैभव महान है।
संतोष और सद्भाव ही,
जीवन की शान है।
जिस हृदय में करुणा हो,
वही सच्चा धनी है।
जिसके कर्मों में सेवा हो,
वही प्रकाशमयी है।

आओ, मिलकर आज,
एक वचन निभाएँ।
किसी दुःखो चेहरे पर,
मुस्कान सजाएँ।
नफरत की जगह प्रेम,
मन में बसाएँ।
अंधकार के हर कोने में,
आशा के दीप जलाएँ।

जगमग हो हर द्वार,
खिले हर मन में प्रकाश।
हर जीवन में प्रेम हो,
हर हृदय में विश्वास।
दीपों का यह पर्व,
शुभ संदेश दे जाए।
भारत की पावन धरती,
सुख-समृद्धि से भर जाए।

खुशियों की फुलझड़ियों से,
हर चेहरा खिल जाए।
आशाओं के रंगों से,
हर सपना सज जाए।
कोई न रहे अकेला,
कोई न निराश हो।
हर घर में प्रेम का,
मधुर मधुमास हो।

अमावस की रात में,
जब लाखों दीप जलेंगे।
मन के सूने आँगन में,
नए सपने पलेंगे।
यही कामना रहे,
हर जीवन मुस्काए।
विश्व के हर कोने में,
शांति का दीप जल जाए।

दीप जलें तो,
केवल घर का अँधियारा दूर न हो।
मन में इतनी ज्योति जगे,
कि कोई हृदय अधूरा न हो।
दीपावली का अर्थ,
तभी साकार हो पाएगा।
जब एक दीप किसी दूसरे के,
जीवन में प्रकाश लाएगा।

आओ,
दीप से दीप जलाएँ।
मन से मन का मेल बढ़ाएँ।
प्रेम, दया, विश्वास और सेवा से,
एक सुंदर संसार बनाएँ।

रचनाकार – पल्लवी श्रीवास्तव
ममरखा, अरेराज, पूर्वी चम्पारण(बिहार)




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