"गुरु-महिमा"
यह परंपरा केवल ज्ञान नहीं, एक पावन आचमन है,
युगों-युगों से बहती आई, चेतना का यह प्रवाह है।
कबीर की साखी, तुलसी की चौपाई में गुरु गूँजते हैं,
आरुणि और धौम्य के समर्पण में, हम निष्ठा को खोजते हैं।
एकलव्य ने मूक साधना से, गुरु-भक्ति का इतिहास लिखा,
अंगूठा देकर भी उसने, गुरु-पद का सच्चा मान रखा।
उपमन्यु की अगाध श्रद्धा ने, तिमिर में भी प्रकाश भरा,
शिष्य का सच्चा भाव देखकर, स्वयं देवों का हृदय द्रवित हुआ।
दत्तात्रेय ने प्रकृति को माना, गुरु का रूप अनूप,
कीट-पतंग और पवन-धरा से, सीखा सत्य का अमर स्वरूप।
वशिष्ठ के तप और विश्वामित्र के, दिव्य अस्त्र-शस्त्राभ्यास से,
निखरा राम का पावन चरित्र, महामानव के दिव्य प्रकाश से।
संदीपनि के आश्रम में जब, कृष्ण-सुदामा साथ रहे,
विद्या और संस्कार सीखकर, वे जन-जन के प्राण बने।
द्रोण की शिक्षा से अर्जुन का,
गांडीव अजय हुंकार हुआ,
और चाणक्य के नीतिकल्प से, मगध का वह उद्धार हुआ।
चंद्रगुप्त को गढ़कर जिसने, अखंड भारत का स्वप्न बुना,
एक साधारण बालक को भी, सम्राटों का सिरमौर चुना।
समर्थ रामदास के मार्गदर्शन से, शिवाजी का स्वाभिमान जागा,
स्वराज की पावन ज्वाला से, हर कायरता का अंधकार भागा।
विवेकानंद को रामकृष्ण ने, जब दिव्य दृष्टि का दान दिया,
तो गूँज उठा विश्व पटल पर, भारत का स्वाभिमान नया।
शिकागो की उस सभा में जब, 'अमृत के पुत्रों' का गान हुआ,
सनातन संस्कृति की ध्वजा फहरी, हर भारतवासी का मान हुआ।
तप, त्याग और साधना की यह, अमर-अखंड कहानी है,
गुरु की चरण-धूलि से सिंचित, भारत की यह माटी धानी है।
युग बदले, इतिहास बदला, पर गुरु का स्थान न कभी ढला,
जिसने थामी गुरु की उंगली, वो भवसागर से पार चला।
रचनाकार- पल्लवी श्रीवास्तव
ममरखा, अरेराज, पूर्वी चम्पारण (बिहार)


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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