दर्द देने वाले ही,हमसाये निकले
जिन्हें अपना समझा,पराये निकले।
फूल मुरझाए थे, खुशी -नम मौसम में,
ख़बर ली तो वो, भौरों के सताये निकले।
आंखों में चिंगारी,हांथो में पत्थर उसकी,
शायद वो, सियासत के सीखाए निकले।
उसकी पलकें डगमगाई तो पूछ लिया
इश्क में किसी आंखों से पिलाये निकले।
हर कदम सम्हल सम्हलकर रखता है
पता किया, वो, तो,ठोकर खाये निकले।।
यह रचना, रचनाकार के
सर्वाधिकार अधीन है
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The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







