(बाल कविता)
चूहा जान बचा कर भागा
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बिल्ली ने जब ध्यान लगाया ।
चूहा बिल के बाहर आया ।।
आँख बंद थीं मौसी की ।
खीर रखी थी लौकी की ।।
चूहे का फिर मन ललचाया ।
पानी मुँह से बाहर आया ।।
खीर जरा सी खाया लेकर ।
नाचा बार बार खुश हो कर ।।
लेकिन मन था अब भी भूखा ।
इसीलिए जा फिर से टूटा ।।
चबर चबर जब उसने खाया ।
बर्तन थोड़ा सा खनकाया ।।
बिल्ली ने फिर आँखें खोली ।
थोड़ा इधर उधर भी डोली ।।
चूहे को जब देखा खाते ।
देर लगी न उसे उठाते ।।
खीर खा लिया तूने मेरी ।
अब आएगी शामत तेरी ।।
मैं तो तुझको खाऊँगी अब ।
अपनी भूख मिटाऊंगी अब ।।
चूहा बोला मुझे न मारो ।
खीर बची है थोड़ी खा लो ।।
मांस बहुत है कड़ुआ मेरा ।
सत्तर रोगों ने भी घेरा ।।
खीर बहुत मीठी है खाओ ।
इधर उधर मन मत भटकाओ ।।
तभी खीर की खुशबू आई ।
बिल्ली खुद को रोक न पाई ।।
चूहे को झट उसने छोड़ा ।
एक मिनट में खुद को मोड़ा ।।
खीर खा गईं मौसी पूरी ।
इच्छा फिर भी रही अधूरी ।।
और खीर जब उसने माँगा
चूहा जान बचा कर भागा ।।
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~राम नरेश 'उज्ज्वल'


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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