(कविता)
अपने भीतर का जंगल
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मैंने बसा लिया है
एक घना जंगल
अपने भीतर
हमेशा के लिए
जिसे काट पाना
कुल्हाड़ी आरी के वश की बात नहीं है ।
ये जंगल है सुखद
स्मृतियों
दुखद घटनाओं
प्रतिस्पर्धाओं
जीत और हार का
नफ़रत और प्यार का।
ये जंगल है
बचपन
जवानी
बुढ़ापे के कर्म कुकर्मों के वृक्षों का ।
इस जंगल में है
माँ का भूखा तन
पिता का सूखा मन
इसकी डालों पर हैं
कई अद्भुत घोंसलें
हँसने-हँसाने
मुस्कुराने
रोने गिड़गिड़ाने के ।
इस जंगल में है
चीथड़े की तकिया
टूटी-फूटी मचिया
फटी-पुरानी कथरी
पैबंद लगे कपड़े
और बहुत सारे लफड़े।
ये जंगल है
गरीबी मजबूरी बेबसी
लाचारी निर्धनता
दीनता के हरे भरे वृक्षों
एवं कत्ल हत्या
और भुखमरी के चश्मदीद गवाहों के मुखौटों का।
ये जंगल है
मेरी ईमानदारी बेईमानी
बुद्धिमानी होशियारी
और बेवकूफी का
याद रखना है सदा।
ये जंगल है
दूध में रोटी मींस कर
खिलाने का
अपने बच्चों को जिलाने
की कोशिश का ।
ये जंगल है
संघर्षों का
अपने जीवन के विमर्शों का ।
ये जंगल है
खोने-पाने की मीमांसा करना
जीवन के जोड़-घटाने
गुणा-भाग कर सही सवाल के जवाबों को पाने का ।
अब कुछ नहीं है मेरे पास
सिवाय घने अनमने
अतीत के पुराने जर्जर
वृक्ष की पुरानी शाखों की पत्तियों के सिवा।
इस जंगल के सहारे ही
कट रहा है जीवन
और जीवन के साथ तैयार हो रहा है
बीहड़ जंगल
घना और घना ।
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~राम नरेश 'उज्ज्वल'


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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