"ये शब्दकोश मेरे सारे तुझको हे प्रिये"
ये शब्दकोश मेरे सारे तुझको हे प्रिये,
समर्पित हैं गीत छंद कविता मेरे सारे तुझको अर्पित हैं।
तेरे श्रृंगार के धूप से अब छांव कहाँ मैं पाऊंगी,
हे प्रिये न कर इंकार इसे,
मैं जीवित रह न पाऊंगी।
तू जलज पंकज नीर है, तू ही तो मेरा धीर है।
तू वाकपटु दोहे जैसी और अलमस्त कबीर है।
मैं मैथिली, तू उर्मिला जिनके संग वियोग चला।
तू है उर्वशी, मैं दिनकर, तू आंसू और मैं जयशंकर।
मैं कालीदास, तू शकुंतला,
जिसके सम्यक साहित्य चला।
तू गंगा जैसी अविरल धारा, मेरे मन में बहती है तू
इस समाज का कटु प्रश्न जो मुझसे पूछा करती है,
इस प्रौढ़वाद के मूल्यों में नारी कितना कुछ सहती है।
फिर भी सृष्टि निष्ठुर निर्दयी भावना नहीं समझती है।
पर मेरे लिए तू अनवरत अमृत, जो रक्त संग बहती है और बनकर जीवन द्रव्य यही तन संग सदा ही रहती है।
फिर भी मन व्याकुल इस समाज से जाने क्यों,
चिंतित है एक प्रश्न समाज के पृष्ठों पर अब जाने क्यों इंगित है।
ये शब्दकोश मेरे सारे तुझको हे प्रिये समर्पित है।
गीत छंद कविता मेरे सारे तुझको अर्पित है।
मैं यक्ष भटकता पर्वत पर तू रहे संगिनी उस तट पर। तू है प्रेम प्रगाण तनु और मैं तेरा विश्वास बनू। तू सौम्य रूप उगते घासो का और मैं तेरा पाश बनू । यह भौगोलिक जो दृश्य तेरा यह परिधान परिदृश्य तेरा। यह भौतिकता का वर्तमान जिनसे है भूत भविष्य मेरा।
इन भूत भविष्य की बातों में क्यों वर्तमान निर्लज्जित है।
कटु शब्दों के भावार्थ विचारों में तेरे क्यों निर्मित है।
ये शब्दकोश मेरे सारे तुझको हे प्रिय समर्पित है, गीत छंद कविता मेरे सारे तुझको अर्पित है।
यह प्रेम प्रसंग तेरा मेरा बन पृथक नहीं अब रहता है,
प्रतिदिन कोयल के कंठो से कल कल गान किया करता है।
यह पंख पसारे पक्षी बन आकाश में उड़ता रहता है,
और स्वप्न सरीखे तारों संग मुस्कान भरा करता है।
इस प्रेम पृष्ठ पर मैं सदैव श्रृंगार लिखा करती हूं ,
तेरे मेरे मिलने का आधार लिखा करती हूं। तू शांत सरीखे उपवन जैसी सदा महकती रहती है ।
उस आजाद चिरैया जैसी सदा चहकती रहती है।
फिर भी जाने क्यूं तू विपदाओं से चिंतित हैं,
तेरे आंखों में प्रश्नों का एक जल समूह क्यों इंगित है।
ये शब्दकोश मेरे सारे तुझको है प्रिय समर्पित है गीत छंद कविता मेरे सारे तुझको अर्पित हैं।
रचनाकार- पल्लवी श्रीवास्तव
ममरखा, अरेराज, पूर्वी चम्पारण (बिहार )


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
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