इस तमाम दर्द-ए-आगोश क़ो भूल जाना चाहती हूँ
बस एक दफ़ा ही सही मैं भी मुस्कुराना चाहती हूँ
तपती धूप में रेत के धोरो सा जलता कलेजा मेरा
चंद छिंटे तेरी मुहब्बत के ख़ुद पे गिरना चाहती हूँ
ये औरत ज़ात होने का अख़लाक़ खा गया मुझकों
वरना झंज़ीरें तोड़कर ख़ुद क़ो आज़माना चाहती हूँ
ख्वाहिश ख़त्म हों गई मेरी, कोई उम्मीद भी न रही
ये ज़िस्म छोड़कर दो गज़ में सिमट जाना चाहती हूँ
काश के ये काश मेरा पीछा छोड़ देता कभी न कभी
काश कह पाती सबसे परे तेरे पास आना चाहती हूँ
इस जहाँ सें बहुत थक गई हैं आपकी जान मेरे जानाँ
आपके सीने सें लिपट कर ज़ार-ज़ार रोना चाहती हूँ
कृष्णा पे माँ-बाप की तरबियत का अहसान हैं वरना
ज़ात के रिवाज़ सें परे हर हाल में अपनाना चाहती हूँ...
-कृष्णा शर्मा
अख़लाक़ = संस्कार


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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