ये बात हक़ीक़त नहीं, किसी ने इन अफ़वाहों को हवा दिया है,
हमें फूलों के ख़्वाब दिखाकर, ख़ार-ज़ार में सुला दिया है।
जिनसे हमें सरपरस्ती की तमन्ना रही उम्रभर,
उसने हर मोड़ पर हमें तन्हा किया है।
जिन्हें चुना था हमने हमसफ़र-हमनुमा ज़िंदगी का,
उसने हमसे अपना दामन छुड़ा लिया है।
अब निकल आए हैं हम भी उनके उस जहाँ को छोड़कर,
जिस जहाँ में उसने हमें रुसवा किया है।
उसने भी मिटा दी हैं हमारी यादें अपने ज़ेहन से,
हमने भी उनका ख़त-ए-ख़्वाब जला दिया है।
अब रुखसार पे मेरे अश्क़ ठहरते नहीं हैं,
हमने आँखों से पूरा दरिया बहा दिया है।
जो ख़्वाबों में दिखा था मुझे, अँधेरे में चराग़ जलाता हुआ,
हक़ीक़त में उसने मेरे ख़्वाबों को जला दिया है।
अब सिख रहे हैं हम भी मसखरे सा हुनर,
इन मुस्कुराहटों के पीछे हमने दर्द छुपा लिया है।।
कमलकांत घिरी ✍️


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







