वो झील पर किसी का इंतजार कर रही थी
खामोशियों से जैसे इकरार कर रही थी
लहरों से पूछती थी हाल उसके आने का
हर दस्तक पे दिल बेकरार कर रही थी
डूबते सूरज में उसका चेहरा कुछ यूं खो गया
आंखों से वो शाम को गुलजार कर रही थी
हाथों में थामा था एक अधूरा सा खत
लफ्जों में दिल को बयां बार बार कर रही थी
ना आया वो ना टूटा उसका यकीन
खुद से ही अपने दिल को समझदार कर रही थी
रात ढली तो चांद से बात करने लगी
तन्हाइयों को अपना हमराज कर रही थी
हवा के झोंको में उसकी आहट ढूंढती रही
हर साया जैसे उसका दीदार कर रही थी
वक्त की रेत हाथों से फिसलती ही गई
फिर उम्मीद को वो बरकरार रख रही थी
आखिर थककर वो झील किनारे ठहर सी गई
और अश्कों से दिल का इजहार कर रही थी
वो झील पर किसी का इंतजार कर रही थी
शायद खुद से ज़्यादा किसी और से प्यार कर रही थी


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







