मैं अपने उसूलों को तोड़ नहीं सकती,
मैं अपने उसूलों को तोड़ नहीं सकती
हाॅं तोड़ भी दूं उसूलों को अपने अगर वो
इंसान सुधर जाए।
पर अब वो इंसान कहां रह गई है,
वो तो हैवान बन गई है।
लग तो रहा है कि उसका दिल पिघल रहा है,
पर मैं उसे माफ़ कर नहीं सकती।
क्योंकि माफ़ उसे किया जाता है
जो फिर ग़लती ना दोहराए, और वो तो गिरगिट सी है पल - पल में रंग बदलती है
उसे माफ़ करना तो माफ़ी की भी तौहीन होगी।
कितने बरस लग गए उसे समझने में,
बचपन से ही परखती आई हूॅं।
बचपन बीता,जवानी बीती,
तब जाकर वो पूरी तरह से अब समझ में आई है।
हर दफ़ा माफ़ कर देने के बाद भी वो सुधरी नहीं,
और फिर से उसे माफ़ करना बेवकूफी होगी।
अगर अब भी कर दिया उसे माफ़ मैंने,
तो फिर वो तो मेरे उसूलों की तौहीन होगी।
🖋️🖋️रीना कुमारी प्रजापत 🖋️🖋️
सर्वाधिकार अधीन है


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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