"दो दिल के मेहमान है, पर किसी के दिल में नहीं,
फ़ुरसत के इतने दिन जो किसी फ़ुरसत में नहीं,
नहीं आना था, ना आना रहा,
क्या कहूँ कि किस पल नजराना रहा,
ऐसी बेदर्दी दर्द ले लूँ, क्यूँ तो क्यूँ नजरिए से झेल लूँ,
तुम क्यूँ तो हो जाते हो, अब क्या नहीं है क्या चाहते हो, इतने दिन के उजाले, कहां थी खुशनसीबी,
खूब थे शिकंजे किसके साथ बिताते हो,
ये तो खामोश होना तुम्हारी आवाज में ही,
मेरा चुप होना ठीक था,
जीने का तरीका मैंने देखा, थोड़ा बदला क्या ये ठीक था।
सब कुछ देख रहा हूँ कि,
संसार भाग रहा है जिस जिस के लिए,
वो सब क्यूँ क्या है आखिर,
उनको भी देखा है मैंने अकेले, खाली, बिखरे और दूरी में,
वो जिसे तुम चाहते हो,
वो तुमसे घुट चुका है,
वो तुम्हें मिल जाएगा,
पर तुमसे मिल नहीं पायेगा,
इसलिए किताबें भरी है भारी है,
और इतना शोर है।।"
- ललित दाधीच


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







