तू बन आया सदाबहार,
जीवन रूपी बंजर ज़मीं पर मेरी।
आते ही तेरे खिलखिला उठी मैं,
तन - मन में सुकून की लहर उठी।
खड़ा हो जैसे सूखा बबूल,
थी मैं भी निर्जर ऐसी,
अब खिली रहती हूँ जैसे
खिली गुलाब की कली - कली।
ना था कोई वजूद मेरा
तेरे बिना मेरे कन्हैया,
अब खुशबू उड़ती है दूर - दूर ऐसे
जैसे रात रानी, चंपा और चमेली।
जीवन था बंजर भूमि सा
आया तू और बना दिया
हरा - भरा बागान उसे।
वंचित थी प्रेम के
खूबसरत एहसास से ये नादान,
वैरागी बनी इस ज़िद्दी को
प्रेम सिखलाया तूने।
💐 रीना कुमारी प्रजापत 💐
यह रचना, रचनाकार के
सर्वाधिकार अधीन है
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The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







