हर पल ये नज़रें तुझे ही ढूंढती हैं,
क्यों तू इस विरहनी को यूं
विरह में रखता है।
तन्हाइयां बढ़ती जा रही हैं धीरे - धीरे,
क्यों तू इससे इतनी लंबी
दूरी बना लेता है।
ख़याल है आज का तुझे
कितना वक्त गुज़र गया,
सुबह मिले थे थोड़े,
बाकी पूरा दिन इंतज़ार में कट गया।
सुबह से दोपहर
और फिर अब रात हो चुकी है।
इन आंखों को अब इंतज़ार की
लत लग चुकी है।
आँखों से आंसू थमते नहीं इसके अब,
उम्मीद में हैं कि
अभी आके आवाज़ देगा तू इसे।
बच्चों सी रोती है रे ये तेरे इश्क़ में,
इतना ना पिघला इश्क़ आग में तू इसे।
✍️ रीना कुमारी प्रजापत 'मनस्वी'✍️
यह रचना, रचनाकार के
सर्वाधिकार अधीन है
सर्वाधिकार अधीन है


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







