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Dastan-E-Shayara By Reena Kumari Prajapat

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The Flower of WordThe Flower of Word by Vedvyas Mishra
The Flower of WordThe novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra

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Dastan-E-Shayara By Reena Kumari Prajapat

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The novel 'Nevla' (The Mongoose), written by Vedvyas Mishra, presents a fierce character—Mangus Mama (Uncle Mongoose)—to highlight that the root cause of crime lies in the lack of willpower to properly uphold moral, judicial, and political systems...The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra

कविता की खुँटी

                    

स्वाभिमान की नई फसल

स्वाभिमान की नई फसल
​एक ही शहर के दो छोरों पर दो अलग-अलग दुनिया बसती थीं। शहर के पॉश इलाके में एक बड़ा, आलीशान मकान था, जहाँ रामेश्वर जी अपने दो छोटे बेटों के साथ रहते थे। दोनों बेटे सरकारी नौकरी में थे, परिवार संपन्न था और वहाँ हर दिन खुशियों का मेला लगा रहता था।
​वहीं, शहर के दूसरे कोने पर एक छोटा सा किराए का कमरा था, जहाँ उनका बड़ा बेटा सोहन अपने दो बच्चों के साथ रहता था। सोहन के पास न तो सरकारी नौकरी थी और न ही पिता का साथ। मंदी के कारण उसकी प्राइवेट नौकरी भी छूट चुकी थी, जिससे वह बेरोजगार हो गया था। बच्चों की स्कूल की फीस और राशन का इंतजाम करना उसके लिए हर दिन एक नया पहाड़ चढ़ने जैसा था।
​एक शाम, सोहन का छोटा बेटा बोला, "पापा, दादाजी के घर तो इतनी बड़ी गाड़ी है, सब लोग साथ रहते हैं। हम वहाँ क्यों नहीं जाते?"
​सोहन के पास इस बात का कोई सीधा जवाब नहीं था। अलगाव के अपने कारण थे, लेकिन उसने हार मानना नहीं सीखा था। उसने मुस्कुराकर बेटे के सिर पर हाथ रखा और कहा, "अपनी मेहनत से बनाई छोटी सी झोपड़ी भी, दूसरों के महलों से ज्यादा सुकून देती है। हम अपनी दुनिया खुद बनाएंगे।"
​उसी रात, सोहन ने तय कर लिया कि वह अब नौकरी के भरोसे नहीं बैठेगा। उसने अपनी बची-कुची जमापूंजी से घर के बाहर ही शाम को नाश्ते और चाय का एक छोटा सा स्टॉल लगाना शुरू किया। शुरुआत में लोग तरह-तरह की बातें करते थे—"देखो, भाई सरकारी अफसर हैं और यह यहाँ चाय बेच रहा है।"
​लेकिन सोहन ने अपनी नजरें सिर्फ अपने बच्चों के भविष्य और अपनी मेहनत पर रखीं। उसने स्वाद और सफाई से कोई समझौता नहीं किया। धीरे-धीरे उसकी ईमानदारी और मेहनत रंग लाने लगी। लोगों को उसका व्यवहार और हाथ का स्वाद इतना पसंद आया कि कुछ ही महीनों में वह छोटा सा स्टॉल एक मशहूर कैफे में बदल गया।
​एक दिन, रामेश्वर जी अपने सरकारी अफसर बेटों के साथ उसी रास्ते से गुजर रहे थे। उन्होंने देखा कि सोहन के कैफे पर पैर रखने की जगह नहीं थी और सोहन शान से अपने बच्चों के साथ वहाँ काम संभाल रहा था। सोहन की आँखों में आज कोई शिकायत नहीं थी, सिर्फ एक गहरी संतुष्टि और आत्मसम्मान की चमक थी।
​रामेश्वर जी को समझ आ गया था कि संपन्नता सिर्फ सरकारी तिजोरी से नहीं, बल्कि इंसान के मजबूत इरादों और खुद्दारी से आती है। सोहन ने साबित कर दिया था कि भले ही वह अपनों से अलग था, लेकिन वह कमजोर नहीं था।
सत्यवीर वैष्णव बारां 💞✒️💞




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