"स्वयं से संवाद"
कभी कभी लगता है,
हम अपनी जिंदगी के मुख्य पात्र नहीं हैं।
बस किनारे पर खड़े होकर,
खुद को ही होते हुए देख रहे हैं।
दिन निकल जाता है,
पर कोई एक भी क्षण ऐसा नहीं होता
जिसे पकड़कर कह सकें
"हाँ, ये मेरा था"।
सब कुछ हो रहा है,
पर कुछ भी "महसूस" नहीं हो रहा।
और अजीब ये है,
ये दर्द भी जोर से नहीं होता।
बस एक हल्की सी खाली जगह होती है अंदर,
जो हर दिन थोड़ी और बड़ी हो जाती है।
जीवन की इस यात्रा में,
हम अपने आप को खोजते हैं।
पर कभी कभी लगता है,
हम अपने ही सपनों के पीछे
छाया की तरह दौड़ रहे हैं।
अंदर की यह खाली जगह,
एक अनकही कहानी लिखती है।
जिसमें हर पल एक नया अध्याय जोड़ता है,
पर हम उसे पढ़ नहीं पाते
बस महसूस करते हैं एक अकेलापन।
इस अकेलेपन में भी,
एक उम्मीद की किरण छुपी होती है।
जो हमें बताती है कि जीवन,
एक नई शुरुआत का नाम है।
और हमें अपने भीतर के पात्र को
जागृत करना होगा।
ताकि हम अपने जीवन के
सच्चे मालिक बन सकें।
कभी कभी रातों में,
जब सब सो रहे होते हैं
हम अपने दिल की आवाज़ सुनते हैं।
और महसूस करते हैं
एक अनकही दर्द की धड़कन।
जीवन की इस यात्रा में,
हम कई रास्तों पर चलते हैं।
पर कभी कभी लगता है,
हम अपने असली रास्ते से
भटक गए हैं।
पर हार नहीं माननी है,
अपने दिल की आवाज़ सुननी है।
और अपने रास्ते पर चलना है,
ताकि हम अपने जीवन के
सच्चे मालिक बन सकें।
हमारे अंदर एक शक्ति है,
जो हमें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती है।
हमारे सपनों को पूरा करने के लिए,
हमारे भीतर एक आग है।
जो हमें जलाती है और आगे बढ़ाती है।
तो चलो, अपने सपनों को पूरा करें,
अपने जीवन को सजाएं।
और अपने भीतर के पात्र को
जागृत करें,
ताकि हम अपने जीवन के
सच्चे मालिक बन सकें।
और कभी कभी लगता है,
हम शब्दों के सागर में डूबे हुए भी
एक मौन से घिरे हैं।
होंठ कुछ कहना चाहें ,
पर हृदय की भाषा कोई समझे नहीं।
भीड़ में खड़े होकर भी,
स्वयं से ही अनजान बने हैं।
समय की शिला पर,
हम प्रतिदिन एक रेखा खींचते हैं।
पर संध्या होते-होते,
वह रेखा भी मिट जाती है।
स्मृति में कुछ शेष नहीं रहता
सिवा एक अधूरे प्रश्न के —
"क्या यही जीवन है?"
परंतु फिर प्रातः की प्रथम किरण,
एक नवीन उत्तर लेकर आती है।
कहती है — उठो, अभी शेष है यात्रा,
भीतर का दीपक अब भी अखंड है।
बस उसे पवन से बचाना है
और स्व से संवाद करना है।
क्योंकि जब तक हम,
अपनी व्यथा को स्वयं नहीं सुनेंगे।
तब तक संसार का कोलाहल,
हमें दिग्भ्रमित करता रहेगा।
अपने अस्तित्व को स्वर दो,
तभी जीवन के वास्तविक नायक बनोगे।
रचनाकार- पल्लवी श्रीवास्तव
ममरखा,अरेराज, पूर्वी चम्पारण (बिहार)


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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