मेरे लिये शिव क्या हैं?
महादेव और मेरा रिश्ता कुछ अज़ीब सा है। जहां सब उनको भगवान मानते हैं हम उनको अपना सर्वस्व मानते हैं। वैसे तो है वो भगवान ही पर जब वो एक पिता बनते हैं तो शायद वो और प्यारे हो जाते हैं।
और मैं भी थोड़ी सी बुद्धू हूं क्योंकि सब हमेशा हमसे यही पूछते हैं कि तुम एक भगवान को अपनी पिता कैसे बोलतीं हो। क्या शिव तुम्हारे अकेल के है? तब मैं हंस कर बोलतीं हूँ नहीं वो वैसे तो सबके है। लेकिन जब बात मेरे पिता की हो तो मैं इसमें थोड़ा स्वार्थी हो जाती हूं। क्यों कि मैं नहीं चाहती कि उनको कोई और भी मेरे तरह माने। और ये हो भी क्यों ना जितना मेरे लिये मेरे पिता ने किया है मेरे महादेव ने किया है उतना कोई कर भी नहीं सकता। पर इसका ये मतलब नहीं है कि मैं उनको बस स्वार्थ के लिए मानती हूं। शिव मेरे स्वास में है कोई मांगें हमसें शीश हमारी हम वो भी दे दे उसे पर मांगें कोई शिव हमारी तो आत्मा काँप उठती हैं ना जाने कैसे और कब वो मेरे लिये इतना जरूरी हो गये कि अब जीना भी उनसे मरना भी उनसे शाम भी उनसे सुबह भी उनसे मेरे स्वास मेरे नस नस में महादेव है और वो ही मेरे पिता भी हैं वहीं मेरी माँ भी हैं सारा जगत् भी वही हैं।


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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