दिली ज़ज़्बात कुबूले मैंने,हाये!ये क्या ख़ता हों गई
सब्र की दवा लेने में आज़ कैसे मुझसें कज़ा हों गई
जाने क्या सोचेगा वो, जाने क्या क्या कर बैठेगा वो
बड़ी कमजोर घड़ी थी शायद कमजोरी पता हों गई
तुम इस बात सें अंदाजा लगा लो मैं कितने दर्द में हूँ
ये ज़हर की शीशी भी आज़ दर्द के आगे दवा हों गई
शायद कई पाप किये होंगे या हत्या तड़पाकर की
कोई वजह होगी ना जो ऐसी जिंदगी अता हों गई
अधर मौन खड़े हैं आँखे अनकहे अश्रु सें बोल रही
उसकी मुहब्बत के आगे रवायत ही मेरी रज़ा हों गई
सब्र इतना था एक आँसू न बहा गैरों के आगे जानाँ
बड़ी मज़बूत सज़र थी तेरे आने सें क्यूँ लता हों गई
उपाय कई पंडित सें पूछे,कई बाबाओ की धूनी की
कृष्णा क़ो न मिला जो कहें पीड़ा अब विदा हों गई...
-कृष्णा शर्मा


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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