राम नाम उर में धरे, तन में अगणित बल।
दीनन के रखवार हैं, काटें जग के छल॥
पर्वत धरते हाथ, सागर लाँघा एक छलाँग,
राम-काज जब सामने, रुकते नहीं हनुमान॥
लंका दहकी पूँछ से, काँपा दशमुख राज।
राम-काज में जल गया, उसका सकल समाज॥
सीता सुधि लेकर चले, राम-नाम की टेक।
भक्ति जहाँ निष्काम हो, वहीं मिलें प्रभु एक॥
संजीवनि ले आए, था बचा लिया प्राण।
सेवा में जो मिट गया, वही सच्चा हनुमान॥
बल पाया तो झुक गए, ज्ञान मिला तो मौन।
सेवा में जो शीश दे, हनुमत जैसा कौन॥
मंदिर-मंदिर क्या फिरो, पहले मन को दक्ष।
राम बसे जिस हृदय में, हनुमंत वहीं प्रत्यक्ष॥
राम बिना हनुमान क्या, हनुमान बिना राम।
भक्त-भगत का भेद मिटे, एक हुआ जब नाम॥
मैं को जिसने जीत लिया, जीता जग संसार।
राम-चरण में जो झुका, वही बजरंग अपार॥
धन न माँगूँ, यश न माँगूँ, न माँगूँ सम्मान।
अंतिम साँस रहे मुख पर, केवल श्रीराम नाम॥
तन छूटे, मन राम में, साँस रहे श्रीराम।
ऐसी कृपा कर दीजिए, मेरे वीर हनुमान॥
जय बजरंग बली!
जय श्रीराम!🙏
डॉ. अखिलेश श्रीवास्तव


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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