हर वक़्त खुद को, बुलंदी-ए-मक़ाम पे रखूँ कैसे..
बेवफ़ा-दिल को, मुहब्बत के काम पे रखूँ कैसे..।
नहीं रहता कायम सदा, सिलसिला-ए-खुरामी भी..
दिल कहे में न था, तो ज़ुबां को भी लगाम पे रखूँ कैसे..।।
बाज़ार -ए-दिल में है, उतार-चढ़ाव इस कदर कि..
अपनी धडकनों की कैफ़ियत को कोई दाम पे रखूँ कैसे..।
मैं कब तक इकतरफा, गिरफ़्तारी -ए- मुहब्बत में रहूँ उनकी..
और इस आलिम-ए-दिल को लुत्फ़-ए-कलाम पे रखूँ कैसे..।
कि ज़रा से ख़्याल से ही, चश्म-ए-तर होती है निगाह..
उन पोशीदा जज्बातों को, ख़याल-ए-मंज़र-ए-'आम पे रखूँ कैसे..।
पवन कुमार "क्षितिज"


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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