🌿 कविता: धरा का क्रंदन और हमारा कर्तव्य 🌿
हरी-भरी इस धरती को, आओ मिलकर आज बचाएं,
सूखे पड़े इन मैदानों में, फिर से नए दरख्त लगाएं।
नदियाँ जो जीवन देती हैं, वे मैली होती जाती हैं,
रुकती साँसें इंसानों की, हमको यही बताती हैं।
ऊँचे-ऊँचे इन पहाड़ों से, बर्फ पिघलती जाती है,
चेतावनी ये संकट की, कुदरत हमको सिखलाती है।
मत काटो इन जंगलों को, ये पशु-पक्षियों का घर हैं,
अगर उजाड़ा इनका आँगन, तो हमारा कल बेघर है।
एक बूँद पानी की कीमत, अब हमको पहचाननी होगी,
धरती मां की यह करुण पुकार, दिल से सबको माननी होगी।
प्लास्टिक का ये जहर हटाओ, माटी को अब शुद्ध करो,
अपनी लालची आदतों से, कुदरत का मत युद्ध करो।
चलो उठाएं एक कदम हम, नया सवेरा लाना है,
आने वाली हर पीढ़ी को, एक सुंदर उपहार सजाना है।
जब महकेगी अपनी धरती, तब जीवन में खुशहाली होगी,
प्रकृति का संरक्षण ही, इस दुनिया की रखवाली होगी।
— कवि सत्यवीर वैष्णव✍️


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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