बिजली कटौती
गर्मी की दोपहरी भारी,
आसमान से आग उतारी।
बिजली फिर हो गई लाचारी,
पंखा रुका, कूलर हारा,
पसीने से बदन हुआ नम।।
सूरज छत पर नाचे तांडव,
दीवारें भी उगलें अंगारे।
पानी भी अब गरम मिले,
मटका बोले – मुझको जला रे।।
बच्चे बिलखे, बूढ़े कराहें,
नींद आँखों से दूर जाए।
दादी बोले – हाथ-पंखा लाओ,
नानी गिनती तारे जाए।
मच्छर कान में गीत सुनाएं,
रात कटे कैसे, बतलाएं?
अगरबत्ती भी काम न आए,
कॉइल जली पर धुआं न जाए।।
मोबाइल भी मुंह लटकाए,
एक प्रतिशत पर दम अटकाए।
पावर बैंक भी सो गया भाई,
चार्ज बिना अब कौन सहाई।।
टीवी डिब्बा बना खिलौना,
सीरियल छूटे, छूटा रोना।
फ्रिज बना अब गरम बिछौना,
बर्फ पिघलकर पानी होना।
दूध-दही सब खट्टे हो जाएं,
सब्जी सड़कर बदबू लाएं।।
इंवर्टर भी दे दे जवाब,
बैटरी बोले – अब ना तड़पाओ।
चार घंटे में दम तोड़ दूंगा,
फिर अँधेरा ही अँधेरा पाओ।।
दुकानदार का काम अटका,
कंप्यूटर बंद, प्रिंटर लटका।
दर्जी की मशीन भी मौन खड़ी,
लुहार की भट्टी पड़ी ठंडी।
वेल्डिंग वाले चाय बनाएं,
ग्राहक आकर वापस जाएं।।
छात्रों का बुरा हाल हुआ,
ऑनलाइन क्लास बीच में छूटी।
नेट चला गया, लाइट गई,
परीक्षा सिर पर, नींद रूठी।
मोमबत्ती में पढ़े तो कैसे,
आँखें जलें, काजल छूटे।।
शाम हुई तो छत पर मेला,
हर घर से निकला अलबेला।
तखत, दरी और चारपाई,
हाथ-पंखे की हुई सगाई।।
"आई कि नहीं?" शोर मचाए,
जैसे ही बल्ब टिमटिमाए।
बच्चे चिल्लाएं – आ गई, आ गई,
दो मिनट में फिर चली गई।।
हे बिजली रानी, दया दिखाओ,
अँधेरे से हमको बचाओ।
बिल तो समय पर भरते हैं,
मीटर रीडिंग भी करते हैं।
जुर्माना भी चुपचाप सहते,
फिर भी कटौती क्यों रहते?।।
लाइनमैन भैया को मनाओ,
ट्रांसफार्मर को तेल पिलाओ।
तार पुराने बदलवाओ,
हमको चैन की नींद सुलाओ।।
बस एक अरज है तुमसे प्यारी,
ना जाओ छोड़ के बारम्बारी।
आओ ना, अब मान भी जाओ,
रोशन फिर से घर कर जाओ।।
रचनाकार- पल्लवी श्रीवास्तव
ममरखा, अरेराज, पूर्वी चम्पारण (बिहार )


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







