पिता की आस
कभी शब्दों में नहीं ढलती,
वह तो हर सुबह
समय से पहले उठी
एक निःशब्द प्रार्थना होती है।
उनकी आँखों में
अपने सपनों से ज़्यादा
हमारी जीत की प्रतीक्षा रहती है,
जैसे हर कदम पर
ईश्वर से कोई अनकही विनती।
पिता की आस
कठोर दिखने वाले हाथों में
छुपी वह कोमल डोर है,
जो गिरते हुए भरोसे को भी
टूटने नहीं देती।
वे उम्मीद रखते हैं
बिना जताए,
विश्वास करते हैं
बिना शर्त,
और सहते हैं
बिना शिकायत।
पिता की आस
दीये की लौ सी है—
आँधियाँ आती रहती हैं,
पर वह
घर का उजाला
बुझने नहीं देती।


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







