एक महंगी उम्मीद से मुझे, बुलाया किसने,
इन आँखों को नजर आता है सब।
उसने नजर से बहतर कुछ जो मांगा ,
तो नजर ही चुरा लेना मुझे, सिखाया किसने।
सिखाया किसने, फिर मुझे,
आंखों से उसकी ओझल हो जाना,
भरे बाजार में एक उम्मीद का मरना,
कातिलों में मेरा नाम शामिल हो जाना।
मैं रुक रुक कर चीखती, चिल्लाती
मरती हुई उसे देखकर सोचूं
के लड़ जाऊं उस उम्मीद को,
खरीद के खा जाने वालों से।
अंततः पैरों को घर की ओर बढ़ाया किसने
अगले दिन, न कोई चीख थी, न चिल्लाहट
न उम्मीद, उसे कसाइयों ने मार दिया।
वो बहुत तड़पी होगी कटने से पहले
जब लोगों ने उसे जकड़ा होगा।
उसके हाथों को, पैरों को कसके पकड़ा होगा।
आखरी वक्त भी शायद मुझे उसने पुकारा हो
क्या पता, नहीं ही पता
के डर का प्याला मुझे पिलाया किसने,
इन मुर्दों की बस्ती में मुझे बुलाया किसने।


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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