धड़कने नासाज़ हुई हैं, क्या तुम कहीं पास से गुजरे हो..
एक सिहरन सी उठी है मन में, क्या तुम भी ज़माने से डरे हो..।
अपनी हर बात तो छुपा ली थी, आंखों के पर्दों में..
तब समंदर ने पूछा भी था, तुम और कितने गहरे हो..।
ये शाम का रंग, आज इतना गहरा सा क्यूं रचा है..
लगता है तुम भी ख्वाबों को लेकर उसकी रगों में कहीं बिखरे हो..।
मैं तो इस जन्म में तो किसी तरह से जब्त-ए-जज़्बात कर लूंगी..
ज़माना तुम्हारी, अग्नि-परीक्षा न ले, क्या तुम इतने खरे हो..।
न आसमां में तस्वीर है कोई, न ज़मीं पे निशां कदमों के..
न ख्वाबों में ही कोई झलक है, फ़िर तुम किस मंजर पे ठहरे हो..।
पवन कुमार "क्षितिज"


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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