पर्दे के पीछे का सच
डॉ.एच सी विपिन कुमार जैन "विख्यात"
जो दिखता है आँखों को, ज़रूरी नहीं वही सच हो,
सजा हुआ जो बाहर से, ज़रूरी नहीं वही मंच हो।
चमकती धूप के पीछे ही, अक्सर बादल छिपते हैं,
झूठ के मखमली पर्दों में, कई हादसे पलते हैं।
मत देखो तुम सिर्फ़ वही, जो दुनिया तुम्हें दिखाती है,
ये चमक-दमक तो अक्सर, आँखों को भरमाती है।
फूलों की कोमलता देखो, पर काँटों को मत भूलना,
हवा की मंद लहरों में, तूफ़ानों को मत भूलना।
चेहरे की जो मुस्कान है, वो बस एक नक़ाब भी हो सकती है,
खामोशी के उस भीतर, एक पूरी किताब भी हो सकती है।
दिखावे की इस भीड़ में, असलियत कहीं सो गई है,
सच्चाई अक्सर शोर के नीचे, चुपके से खो गई है।
गहराई को नापना है तो, सतह को छोड़ना होगा,
दिखावे की हर दीवार को, धीरे से तोड़ना होगा।
जो छिपाया जा रहा है, असली खेल तो वहीं है,
जिसे लोग 'असंभव' कहें, शायद मेल तो वहीं है।
अपनी अंतरात्मा की आँखों को, ज़रा तुम अब खोलो,
दिखावे के उस तराज़ू में, सच को कभी न तोलो।
जिस दिन तुम छिपे हुए, उस मर्म को जान जाओगे,
इंसानियत के असली चेहरे को, तुम पहचान जाओगे।


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







