प्राकृतिक आपदा
प्रकृति ने जब धारण किया अपना विकराल रूप,
मनुष्य क्या, सहम गए जीव-जंतु, पशु-पक्षी अनूप।
नदी, झरना, झील और सागर सब उफान पर आए,
पर्वत, पहाड़ और चोटी भी अचानक से थर्राए।
कल तक था जिनमें प्राकृतिक सौंदर्य का उजियारा,
आज वही दृश्य बन गया विपदा का मारा।
तूफान उठा तो उजड़ गए कितने ही आवास,
अस्त-व्यस्त हो गया जन-जीवन, टूट गई हर आस।
कहीं कोई अपनों को ढूँढ़े, कहीं कोई बिलखाए,
कहीं विलाप, कहीं रुदन, कहीं क्रंदन सुनाई दे जाए।
मनुष्य ने प्रकृति को समझा, केवल अपने सुख का साधन,
भूल गया उसके संतुलन से, जुड़ा है अपना भी जीवन।
पेड़ों को काटा,नदियों को मैला, किया बार-बार,
अब प्रकृति पूछ रही है—क्यों करते हो मुझ पर वार?
आपदा और विपदा शायद कर्मों का ही फल है,
प्रकृति से खिलवाड़ का परिणाम भी, निर्मम और प्रबल है।
मयंक छोटा-सा जीव जगत का, करे विनती बारंबार,
प्रकृति को बचाओ, तभी बचेगा मानव और संसार।
रचनाकार :- डॉ. मयंकेश कुमार दुबे (शिक्षक एवं लेखक)
एम.ए. इतिहास(गोल्ड मेडलिस्ट )
औलेंडा ,आगरा, उत्तर प्रदेश
मो. :-8630291252, 8979776231


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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