मेरे देह के भीतर अग्नि कुंड में ज्वाला जलती।
पीड़ा राख होने तक खुशी बनना सीख जाती।।
ज़रूरत नही मुझे उधार की जुगनू का सहारा।
अँधेरे में डूबी रात सुबह के आगे हार मान लेती।।
जिन छतो पर उतरते मौकापरस्त लोग 'उपदेश'।
उनकी सीढ़ियाँ तोड़कर नीचे-ऊपर किया करती।।
ऐसे दर्पण भी बेकार जो आत्मा नही पढ़ पाते।
चेहरे दिखाते रहते उनको तोड़कर बिखेर देती।।
मैं मिट्टी भी नदी भी बीज भी और आकाश भी।
जितना रौंदोगे 'उपदेश' उतनी हरियाली उगाती।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
गाजियाबाद


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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