""नमक को बुरा क्यों ना लगे,
थोड़ा है तो बहुत स्वाद,
बहुत है तो किस काम का,
बहुत है तो स्वाद खराब, खाना खराब, शरीर बीमार, भूखा रहना पड़ता है,
नमक को बुरा क्यों ना लगे,
गरीब का भोजन है पर किस काम का,
समुद्र में घुला है पर किस काम का,
थोड़ा ही तो स्वीकार है,
बाकी सब बेकार है,
पर मीठा पानी है तो खत्म हुआ,
गंदा हुआ,
आज पानी ही पानी पानी हो गया,
जल था किसी दिन वहीं शुद्ध था,
आज मीठा पानी खुद गंदा हुआ,
सब के कारण बीमार हुआ,
नदियों को मां मां बोली के,
उन्हीं का चीरहरण हजार बार हुआ,
नमक को बुरा क्यों ना लगे,
अथाह है जल का स्रोत यहाँ,
बहुत घुला नमक यहाँ,
बचाया है इस अथाह जल को,
पर बुझा ना पाए ये जन की प्यास पर किस काम का,
पर जीव तो इसमें भी अनन्त हैं,
पर इंसान कब मानेगा,
गंदगी करने तो जाता है,
यहां भी मिल कचरा छोड़ गया,
नमक को बुरा क्यों ना लगे,
नमक आज भी जिंदा है,
आर्थिक स्रोत का कारण भी,
हर घर का पहरेदार है,
पर सदस्य बन जाए तो ,
इतना सच किस काम का,
सच भी तो थोड़ा सा है,
जो जाने वो जिंदगी जी ले,
पूरा दिन सच में रहें,
इतना कड़वा किस काम का,
आत्म परमात्मा का संदेश थोड़ा सा है,
सबका जीवन थोड़ा सा है,
सबको ढंग से जीने दो,
अपना मिथ्या ज्ञान लगाकर,
नए नए भगवान बताकर,
इंसान का सम्मान कहां,
नर नारी को बांटा हमने,
कितना है भेदभाव यहां,
जब समाज ही विज्ञान से ना मिले,
पग पग पर ज्ञान किस काम का,
हर कोने से देखोगे तो,
सबका सत्य है अलग अलग,
जिंदगी को ही ईश्वर समझों,
मृत्यु को जन्म स्थान,
अपने कदमों से थोड़ा ही चलो,
बाकी सफ़र किस काम का,
सत्य तो विकल्प है,
इसका होता चुनाव है,
सत्य तो असंख्य सीढ़ियां हैं,
जितना चढ़ सको उतना चढ़ो,
जहां तक पहुंचें हो,
वो सत्य ही तुम्हारा है,
वो जग ही तुम्हारा है,
इसलिए उस सत्य के एकांतवासी हो,
इसलिए खुद को अकेला पाओगे,
इसलिए औरों का सत्य तुम्हें लगता माया है,
वहां तुम्हें लगती मिथ्या है,
सत्य ही तो एक झूठ है,
सत्य ही तो एक माया है,
सत्य ही तो अधूरा है,
क्योंकि उसको पूरा करते हो,
जिसने जितने सत्य चढ़े,
वहां भी बहुत खड़े होंगे,
पर तुम्हारा अनुभव भी तो ,
उसमें जुड़ता जाता है,
अनुभव तुम्हारा सत्य,
जितनी सीढ़ी तुम चढ़ें,
उतने अनुभव सत्य तुम्हारे भी जोड़ों,
अब देखो,
सब उसी सीढ़ी पर,
पर अनुभव के जुड़ने पर,
सत्य सीढ़ी अलग अलग,
पहली बार जो जिस सीढ़ी पर चढ़ा,
वो था तुम्हारा ईश्वर सत्य,
अब उसके पीछे जो जो पहुंचे,
वो तो उत्तराधिकारी हैं,
जो तुमसे पहले चढ़ा,
जितना चढ़ा,
वो तुम्हारा सत्य,
तुम उसके उत्तराधिकारी हो,
सत्य एक विकल्प है,
सत्य एक अनंत सीढ़ी है,
अंतिम सीढ़ी तो तुम्हारा ईश्वर है,
पर उसका थोड़ा ज्ञान तुम्हें कहां,
तुम्हें तो पूरा ज्ञान चाहिए,
तुम्हें तो अंतिम सत्य चाहिए,
तुम्हें तो मोक्ष चाहिए,
पर वो तो थोड़े में समा गया,
वो थोड़ा सा ही है बचा हुआ,
वो थोड़े से ज्ञान में मिलता है,
वो तो थोड़े अनुभव में है,
थोड़ा ही तो उसका जहां है,
वो अनमेल का मिश्रण है,
इसलिए तुम्हें मेल कराता है,
जो जो उसमें थी असंगता,
पर तुम्हें तो सही दिया,
सबकुछ उसने थोड़े से दिया,
तुमने तो उसे पूरा खोज लिया,
ये कर्म किस काम का,
नमक को बुरा क्यों ना लगे,
निर्जीव के ज्ञान से,
सजीव ना समझे,
ऐसा जीवन किस काम का।।""
- ललित दाधीच


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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