मैदान में शिकस्त आई, तो क्या ग़म है,
कल फिर से फ़तह होगी—यही मौसम है।
बस दिल में चराग़-ए-उम्मीद बुझने न दे,
जब तक ये उजाला है, कहाँ मातम है।
हारा है बदन, दिल तो अभी ज़िंदा है,
सीने में कोई ख़्वाब अभी ज़िंदा है।
दुनिया ने अगर हार का फ़रमान दिया,
मत मान उसे—इक इम्तिहान ज़िंदा है।
जो गिरा है, वही उठने का हुनर जाने,
जो टूटा है, वही जुड़ने का सफ़र जाने।
पत्थर से टकराकर जो लौटा नहीं कभी,
वही आदमी अपने मुक़द्दर जाने।
राहों में अगर ख़ार मिले, ख़ार सही,
क़दमों में अगर दर्द मिले, दर्द सही।
मंज़िल का भरोसा हो अगर दिल में कहीं,
हर ज़ख़्म कहेगा—अभी हार नहीं।
तूफ़ान से कह दे कि मुझे डरना नहीं,
अँधेरों से कह दे कि मुझे मरना नहीं।
जब तक मेरे सीने में धड़कता है यक़ीं,
मुझको किसी मंज़िल से उतरना नहीं।
दरिया ने कहा—राह में रुक जाऊँगा मैं,
पर्वत ने कहा—तुझको थकाऊँगा मैं।
मन मुस्कुराया और कहा दोनों से,
देखूँगा, मगर राह बनाऊँगा मैं।
दुनिया की निगाहों में जो हारा है कोई,
हो सकता है भीतर से सितारा हो कोई।
चेहरे की शिकन देखकर फ़ैसला न कर,
ख़ामोश भी हो सकता है अंगारा कोई।
जीतों का भी इक दिन यहाँ अंजाम हुआ,
हारों का भी इतिहास में नाम हुआ।
जो अपने ही भीतर से न हारा कभी,
उस शख़्स का हर दौर में सम्मान हुआ।
क्या जीत है? क्या हार है? सोचो ज़रा,
सब खेल है इस ज़िंदगी का सिलसिला।
जिसने स्वयं अपने मन को जीत लिया,
उसके लिए क्या हार, क्या फिर फ़ासला।
जब मन में उजाला हो तो रातें कम हैं,
उम्मीद के आगे कहाँ ग़म के ग़म हैं।
इंसान वही है जो अँधेरों में कहे—
मैं ज़िंदा हूँ, मेरे अभी कुछ दम हैं।
एक दीप बचा रखना आँधी के लिए,
एक ख़्वाब बचा रखना वीरानी के लिए।
हालात बदल जाएँगे, इतना यक़ीं रख,
बस मन न बदल देना परेशानी के लिए।
अखिल, ये ज़माना तुझे क्या जीत देगा,
जब तक न तेरा मन तुझे ख़ुद जीत लेगा।
मैदान की शिकस्त को हँसकर सह लेना,
मन हार गया तो कोई क्या जीत लेगा।
तन हार गया तो फिर सँभल जाएगा,
हर ज़ख़्म समय के साथ ही भर जाएगा।
मन की शिकस्त को जीत में बदल ले तू,
फिर तेरा अँधेरा भी निखर जाएगा।
डॉ. अखिलेश श्रीवास्तव


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







