क्या कभी मज़रूह-ए-इश्क़ के तूने हरम नहीं देखे
देखना था उन्होंने कभी दिल के मत्तहम नहीं देखे
मिज़ाज-ए-इश्क़ क्या हैं ये ज़रा मजनू सें पूछना
क्यों उन्होंने महबूब के अना-ओ-अहम नहीं देखे
तुम कहते हों मैंने ख़ुद को आहन-दिल कर लिया
क्या तुमनें मेरी रूह पऱ लामहदूद ज़ख्म नहीं देखे
माफ़िया-तलाफिया किस काम की बंदा मर गया
क्या तुम लोगो ने तुम्हारे दिए हुए बरहम नहीं देखे
किस बात का शिकवा किस बात की शिकायत हैं
तुमनें मेरा इश्क़ नहीं देखा और मेरे वहम नहीं देखे
तुम कहते हों कैसे आता तुम तक निशां न थे कहीं
क्या तुमनें रेत पऱ मेरे वो धुंधले सें कदम नहीं देखे
फ़क़त सुलूक-ए-ख़ुद-नुमा हैं तुम्हारी वफ़ा कृष्णा
ख़ाक मुहब्बत ज़ब तुमनें मुहब्बत के ग़म नहीं देखे..
-कृष्णा शर्मा
आहन-दिल = लोहे जैसा कठोर दिल, लामहदूद = अनगिनत
बरहम = किसी व्यवस्था का बिगड़ जाना, मत्तहम =दोषी
सुलूक-ए-ख़ुद-नुमा = दिखावे की मुहब्बत
मज़रूह-ए-इश्क़ = इश्क़ में घायल मजनू


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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