अनजाने साथी
मुसाफिर थे हम तो
अपनी ही धुन में अकेले चलते थे
न जाने कब
कुछ अनजाने लोग
सफ़र में मिले
और साथी बनकर
साथ चल पड़े ..
वन्दना सूद
यह रचना, रचनाकार के
सर्वाधिकार अधीन है
सर्वाधिकार अधीन है

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अनजाने साथी
मुसाफिर थे हम तो
अपनी ही धुन में अकेले चलते थे
न जाने कब
कुछ अनजाने लोग
सफ़र में मिले
और साथी बनकर
साथ चल पड़े ..
वन्दना सूद
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