मेरा दिल खुली किताब, फिर नुक्ताचीं क्या..
आँखों के आँसू सुख गए, फ़िज़ाँ में फ़िर नमी क्या..।
आसमाँ से उतरती है, रोज़ तुख़्म-ए-ज़िंदगी मगर..
गुल न खिले तो ये फिर, ये दिलकश जमीं क्या..।
वक़्त के झरोखों से, कहीं बहिश्त नज़र नहीं आता..
वो तो हैं मौजू वहीं, कहीं चले गए हैं हमीं क्या..।
राह-ए-ज़िंदगी में, अकेले चलने का है फैसला उनका..
हम-राह होने का, हम पर नहीं था उनको यक़ीं क्या..।
ये ज़ख्मों को कौन देता है, मेरी जिस्म-ओ-जाँ का पता..
अब ज़माने में नहीं है कोई, हमदर्द-ओ-मरहमी क्या..।
पवन कुमार "क्षितिज"


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







