बरखा बरसी, मन भी भीगा,
प्रेम हुआ तो जग रंगीला।
मतवाला मन, मदिरा-सा,
साकी लगता चाँद सजीला।
बूँदों ने जब गीत सुनाया,
मन ने तेरा नाम पुकारा।
भीगी राहें, भीगे सपने,
भीगा-भीगा जग सारा।
मयखाने की शाम सुहानी,
साकी की मुस्कान पुरानी।
जाम छलकता, दिल बहकता,
याद बनी फिर वही कहानी।
प्रेम मिला तो होश गया है,
मन अपना मधु-घट हो आया।
तेरी आँखों की मदिरा ने,
मुझको खुद से दूर कराया।
बरसातों में याद तुम्हारी,
बनकर आती बूंदों जैसी।
छत पर गिरती टप-टप धुन में,
धड़कन बजती ढोलक जैसी।
साकी, आज न जाम पिलाना,
आँखों से ही प्यास बुझाना।
तेरे हाथों का एक इशारा,
बन जाए जीवन का तराना।
मत पूछो यह प्रेम कहानी,
शब्दों में कहाँ समाती है।
एक नज़र जब मिलती है तो,
सदियों की प्यास बुझाती है।
मयखाना भी सूना लगता,
जब प्रियतम पास नहीं होता।
हँसता चेहरा चुप हो जाता,
दिल का मौसम साफ नहीं होता।
बरखा कहती प्रेम अमर है,
बूँद-बूँद में रंग भरा है।
साकी जैसे समय ठहरकर,
देख रहा यह दृश्य खड़ा है।
जाम नहीं, अब प्रेम पिलाओ,
मन की प्यास सदा बुझाओ।
बरखा, साकी, प्रेम और मय—
इनमें अपना जग बसाओ।
रात ढली तो चाँद निखरकर,
भीगे आँगन आया झूम।
प्रेम-सुगंध बिखरी हवाओं में,
मन में खिल उठे फूल।
मदिरा से क्या मोल लगाएँ,
जब प्रेम स्वयं मधुशाला है।
सच्चे मन से जो मिल जाए,
वही सबसे प्याला है।
बरखा थमी, मगर मन बोला,
प्रेम की ऋतु कब थमती है?
साकी चाहे दूर चला जाए,
याद कहाँ फिर रुकती है?
तेरी स्मृति का जाम छलकता,
हर मौसम में रंग नया।
प्रेम रहे तो सूना जीवन,
भीतर से भी लगे भरा।


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







