"मैं माटी हूँ इस पटना की, तुम साथ अपने मुझे बहा लेना"।
पाप की गठरी अब भर चुकी, गंगा में आकर नहा लेना।
मैं माटी हूँ इस पटना की, तुम साथ अपने मुझे बहा लेना।
जब सत्ता की लफ्फाज़ी से गरीब भी सपने बुन लेता।
मैं गाँधी मैदान सा खामोश रहकर, हर झूठ सुन लेता।
तुम जय श्री राम बोलते हो, वो इंशाल्लाह की धुन देता।
मैं महावीर मंदिर सा पावन हूँ, हर बार अज़ान सुन लेता।
पैसेंजर ट्रेन से प्रदेश जाकर, तुम जब खूब पैसे कमा लेना।
मैं माटी हूँ इस पटना की, तुम साथ अपने मुझे बहा लेना।
उम्मीद करूँ क्या दूसरों से, हर बार अपनो से हारी हूँ।
फिर भी कभी धैर्य न खोया, मैं बापूधाम मोतिहारी हूँ।
कोई बिहारी कहकर अपमान करे, तुम बस मुस्कुरा देना।
मुज़फ़्फ़रपुर का लीची बन कर, स्वाद सबको चखा देना।
पहली तारीख को घर पैसे भेजकर, खुद को भूखे सहा लेना।
मैं माटी हूँ इस पटना की, तुम साथ मुझे अपने बहा लेना।
बड़े शहरों की अंधेरी रातों में, अपने संस्कार बचा लेना।
पिज्जा-बर्गर की दुनिया मे, घर का अचार भी खा लेना।
होली-दीवाली अकेले तुम, बिना घर आये तुम मना लेना।
छठ पर्व जब भी पुकारे, तुम बिना रुके घर को आ लेना।
जब गाँव आकर परदेश से, तुम भी बड़े बाबू कहवा लेना।
मैं माटी हूँ इस पटना की, तुम साथ अपने मुझे बहा लेना।
रचनाकार - पल्लवी श्रीवास्तव
ममरखा, अरेराज, पूर्वी चम्पारण (बिहार )


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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