गलियां-ओ-कूचे तंगहाल है, सो खुली हवा न मांग..
वक्त से जियादा, दिल से धड़कने की दुआ न मांग..।
अब गुलों की कोशिशें भी, सब नाकाम हुई जाती हैं..
खुशबुओं की तमन्नाओं वाली, सहर-ओ-सबा न मांग..।
कि कोई वक्त पे तो खाक भी नहीं बचती इंसा की..
सम्भल जा ज़रा, पत्थर पे नाम अपना खुदा न मांग..।
कौन पढ़ता है, तेरी ख्वाहिशों की फहरिस्त को यहां..
दिल में रख ले जो है, इस ज़माने से तो रज़ा न मांग..।
उनकी खामियों पर तो, मेरी निगाह जाती ही नहीं..
रूह-से-रूह की बात है, और कोई वजहा न मांग..।
पवन कुमार "क्षितिज"


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







