मैं कैसे
"कहैं कैसे, जब कुछ तेरा, टुकड़ों में तू जान,
अंश-अंश बिखरा जगत में, कहाँ तेरा पहचान।
ना पाया, ना कुछ खोया, हाथन हाथ चलाय,
जैसे धारा बहत निरंतर, तैसे जगत समाय।
रोटी गंध बनि निकसि गई, देह रही न ठौर,
क्षणिक सुखन की छाँह तले, जीव भटके चौर।
नींद सुकून दे जाग उठाय, ऊँचाई ले जाय,
माया के इस खेल भीतर, मन निश्चल न ठाय।
“कौन” कहत सब भ्रम में फँसे, “कैसे” रहस्य खोल,
जीवन गति की रीति समझ ले, तब ही पावै मोल।
दो पग चले, हाथन छूटे, तब जाना अधिकार,
बंधन टूटे चेतन जागे, मिटा भीतर अंधियार।
मौन बसे करुणा जहाँ, वही पूर्ण विस्तार,
क्षमा-शांति के उस घर में, आत्मा हो उजियार।
मोक्ष बुझत दीपक नहीं, धुंधलाता अविचार,
मौन गगन की गोद में, सच्चा उद्धार अपार।"
- ललित दाधीच
(तुम अब क्या कर रहे हो, ये तुम कहकर नहीं बता सकते क्योंकि कहोगे क्या जब कुछ तुम्हारा हो, जब कुछ तुम्हारा होता तो तुम कुछ कहते, तुम तो टुकड़ों हो वो जिसके एक हिस्से को न तो तुम देख सकते हो न पहचान सकते हो, उस पर तुम्हारा कहां नियंत्रण है, कहां खोज लोगे कि तुमने कुछ खोया जो तुम्हारा था, ना तुम पा सकें ना खो सकते, ये सब एक हाथ से दूसरे हाथ में ही तो जा रहा है, बस एक रोटी जो तुमने वो भी सुबह या थोड़ी देर बाद एक गंध के साथ बाहर निकल गई, एक नींद जो तुम्हें सुकून दी फिर किसी ने या उन अनचाही ऊंचाइयों ने तुम्हें जगा दिया , कोई ये सवाल रखे मैं कौन हूं पर मेरा सवाल है कैसे, क्योंकि कैसे ही सब बता सकता है कि कौन था क्यों था, क्या था, पर ये तलाश हुई कब जब उस पहले इंसान ने जमीन से हाथों को हटा दिया, यानी अगर वो दो पैरों का सिद्धांत ना समझता तो ये इंसान हकीकत में गुलाम होता, जो बच गया यानी कि हमारे शरीर को ये समझने में लगा कि मैं अगर हाथ से काम करता हूं या दो पैरों पर चलता हूं तो मैं स्वतंत्र हूं, गुलाम नहीं हूं, क्योंकि मेरा खून तो मेरे मस्तिष्क तक गया नहीं क्योंकि मैंने अपने दो हाथों का बोझ धरती को दे दिया था अब जब उन्हें हाथ समझा तो समझा कि मैं कौन हूं।।*मैं पर से शुरू होकर उस मैं को ढूंढना इतना आसान नहीं है पर आसान होना ना होना उस परिपूर्णता की पहचान नहीं है, उस पूर्णता का आधार विश्व की उस करुणा और शांति में हैं जो मौन पैदा करती है, और वो मौन ही स्थिर था, वो क्षमा करता है, पर हम उस मौन और क्षमा को खोज नहीं पाए हम उस मोक्ष को खोजते जिसमें सब धुंधला सा दीपक जलता हुआ बुझ जाता है।।*मैं पर से शुरू होकर उस मैं को ढूंढना इतना आसान नहीं है पर आसान होना ना होना उस परिपूर्णता की पहचान नहीं है, उस पूर्णता का आधार विश्व की उस करुणा और शांति में हैं जो मौन पैदा करती है, और वो मौन ही स्थिर था, वो क्षमा करता है, पर हम उस मौन और क्षमा को खोज नहीं पाए हम उस मोक्ष को खोजते जिसमें सब धुंधला सा दीपक जलता हुआ बुझ जाता है।।)


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







