"मैं ही कृष्ण, मैं ही सर्वस्व"
समझ सका न कृष्ण को तू, साथ मेरे था सदा,
ये सृष्टि मेरी कल्पना स्वरूप, मेरा सर्वदा।
मैं सिर्फ कृष्ण हूं नहीं, अनंत मेरे रूप हैं,
मैं ही ब्रह्मांड का कर्ता, मैं ही हूं अनूप हैं।
मैं ही हूं प्रेम का सागर, मैं ही हूं भक्ति का रूप,
मैं ही हूं ज्ञान का मार्ग, मैं ही हूं जीवन का स्वरूप।
मैं ही हूं शिव का तांडव, मैं ही हूं शक्ति का रूप,
मैं ही हूं राम का मर्यादा, मैं ही हूं कृष्ण का स्वरूप।
मैं ही हूं गीता का ज्ञान, मैं ही हूं कर्म का पाठ।
मैं ही हूं जीवन का सत्य, मैं ही हूं मृत्यु का भय,
मैं ही हूं सूर्य का प्रकाश, मैं ही हूं चंद्रमा का शीतल।
मैं ही हूं फूल का रंग, मैं ही हूं पंछी का गीत।
मैं ही हूं सृष्टि का कर्ता, मैं ही हूं प्रलय का काल,
मैं ही हूं जीवन का उद्देश्य, मैं ही हूं मोक्ष का द्वार।
मैं ही हूं अनंत का विस्तार, मैं ही हूं असीम का रूप,
मैं ही हूं कृष्ण, मैं ही हूं सर्वस्व मेरा स्वरूप।
कुरुक्षेत्र की धरा पर, जब युद्ध का बिगुल बजा,
अर्जुन का संशय, मेरे ज्ञान का प्रसाद मिला।
गीता का उपदेश, कर्म का मार्ग दिखाया,
मैं ही हूं कृष्ण, मैं ही हूं जीवन का सहारा।
महाभारत का युद्ध, धर्म का संघर्ष था,
मैं ही हूं कर्ता, मैं ही हूं प्रेरक।
पांडवों का साथ, कुरुवंश का विनाश,
मैं ही हूं न्याय, मैं ही हूं न्याय का आस।
मैं ही हूं द्रौपदी का चीर, मैं ही हूं रक्षा का कर्ता,
मैं ही हूं पांचाली का साथ, मैं ही हूं सत्य का सारथी।
मैं ही हूं भक्तों का प्यार, मैं ही हूं शत्रुओं का भय।
मैं ही हूं कृष्ण, मैं ही हूं सर्वस्व मेरा स्वरूप।
रचनाकार-पल्लवी श्रीवास्तव
ममरखा, अरेराज, पूर्वी चम्पारण (बिहार )


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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