माँ की ममता
दुनिया ने जब भी पूछा—
“तुम्हारे पास क्या है?”
मैंने मुस्कुराकर कहा—
“मेरी माँ है।”
माँ वो नहीं जो सिर्फ़ जन्म देती है,
माँ वो है जो अपने हिस्से की धूप लेकर
बच्चे के लिए छाँव बन जाती है।
मेरी हर ठोकर से पहले
जिसका दिल काँप जाता है,
वो माँ है।
मैंने माँ की आँखों में देखा है—
मेरी छोटी-सी खुशी के लिए
वहाँ पूरा संसार मुस्कुराता है।
वो खुद भूखी रहकर भी पूछती है,
“बेटा, तूने खाना खाया?”
शायद इसी सवाल में
माँ की पूरी दुनिया छुपी होती है।
माँ के हाथों की रोटी में
न जाने कौन-सा जादू होता है,
पेट तो भरता ही है…
दिल भी भर जाता है।
और जब दुनिया से हारकर
इंसान घर लौटता है,
माँ गले लगाकर कुछ नहीं पूछती—
बस इतना कहती है,
“कोई बात नहीं बेटा, मैं हूँ ना।”
सच कहूँ तो माँ कोई रिश्ता नहीं,
वो वो दुआ है
जिसे भगवान ने इंसान का रूप देकर
हमारे पास भेजा है।
और शायद इसीलिए—
माँ के जाने के बाद
घर वही रहता है,
दीवारें वही रहती हैं,
दरवाज़े वही रहते हैं…
बस घर, घर नहीं रहता।
रंजीत भारद्वाज जी
मामरखा अरेराज


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







