एक सोच
एक जटिल धारणा
जो न पढ़कर कभी समझ में आयी
न समझकर समझ में आयी
वही आज संवेदनशीलता से समझ में आयी
जो तर्क नहीं,एक रंज है..
यदि जीवन यात्रा बचपन से युवा होने तक
बड़ों के बिना संभव ही नहीं,
तो फिर न जाने ?
यह सोच समाज में कहाँ से आयी
कि बड़ों के कदमों की रफ़्तार धीमी है
और ये युवाओं के बढ़ते कदमों का साथ नहीं निभा पाती..
कदमों का संग सोच से नहीं,नियत से होता है।
सीखने और सिखाने वाले में बहुत बड़ा फर्क होता है
बड़े अपने कदमों की रफ़्तार यह सोचकर धीमी रखते हैं
कि बच्चों की ज़िन्दगी अनुभवों के बिना कहीं अधूरी न रह जाएँ
चढ़कर उनके अनुभवों की सीढ़ियाँ
अपने जीवन की हर ज़ंग वे जीत जाएँ ..
पर कदम मिलते ही युवाओं ने
अपने बड़ों को पिछड़ा मान लिया।
उनके तजुर्बों को यह कहकर झुठला दिया
“ज़िन्दगी की तेज रफ़्तार में
आप अब साथ नहीं चल पाओगे,
हमारी तरक्की में अब भागीदार नहीं बन पाओगे”
कैसे समझाएँ?
कि अपनों का संग सोच से नहीं,नियत से निभता है
कल वे तुम्हारी बढ़ती उम्र की लाठी बने थे
आज तुम उनकी ढलती उम्र की लाठी बनकर आगे बढ़ो ..
वन्दना सूद (सहलेखक:वीरेन्द्र कपूर)
सर्वाधिकार अधीन है


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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