बाबूजी की छाँव अभी है
नवगीत
धूप पड़ी है तन-मन भीतर,
फिर भी शीतल भाव अभी है।
सच कहता हूँ, तपते सिर पर
बाबूजी की छाँव अभी है।
घर की नींव जहाँ पर रखी,
ईंट-ईंट में लहू जड़ा है,
कंधे पर सपनों की गठरी,
ले पथरीली राह चला है।
खुद की चाह भुलाकर हरदम,
मेरे लिए ही ताप सही है—
सच कहता हूँ, तपते मन में
बाबूजी की छाँव अभी है।
जब भी जीवन थम-सा जाता,
मन में स्वर उनका गूँजता,
और बढ़ा जाता है ढाढ़स—
"टूट न जाना, मेरे बेटे!"
साया हूँ या सपना उनका,
लगता मेरे साथ वही है—
सच कहता हूँ, हर संबल में
बाबूजी की छाँव अभी है।
कभी न माँगा खुद के खातिर
फिर भी मुझको सब दे डाला,
जैसे कोई दीपक जलकर
भरता है चहुँदिश उजियाला।
मैं दुनिया को जीत गया पर,
मन में उनकी ठाँव बसी है—
सच कहता हूँ, इस जीवन में
बाबूजी की छाँव अभी है।
अब भी जब मैं डर जाता हूँ,
एक आवाज़ कहीं से आती—
"मत घबराओ, मेरे बेटे,"
जैसे साँस किसी की गाती।
जिस दिन वे ख़ामोश हुए थे,
उस दिन से एहसास यही है—
सच कहता हूँ, हर साँस में
बाबूजी की छाँव अभी है।
© पंकज पाण्डेय
रोसड़ा, समस्तीपुर (बिहार)


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
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