मां जब माथा चूमती है
उसकी बूढ़ी नर्म गर्म होंठों से
निकलती है,वो अलौकिक ऊर्जा,
ईश्वर का आशीष, स्नेह,
जो,मन को,स्थिर -शांत कर
एक अद्भुत आत्मविश्वास
भर देती है,मन में
मन विचरण करने लगता है
एक अनंत आकाश में, जहां
होती है, सिर्फ और सिर्फ,
चिरानंद -पुष्प से लदी हमारी
निश्छल आकांक्षाओं का
उपवन,
एक चुम्बन, होती है
ईश्वरीय वरदान की फूलों की
वो गठरी, जिसके खुलते ही
नहा लेता है हमारा तन -मन
और काफूर हो जाती हैं
सारी वेदनाएं, शंकाएं,जो
परिवेश ने दिए हैं,
मां जब माथा चूमती है,
बंद हो जातें हैं हमारे
सांसारिक नयन तनिक
क्षण के लिए, और
खुल जातें हैं, हमारे
अलौकिक नयन, फिर
हम देख लेते हैं,एक अद्भुत
स्वर्गीय, रमणीय संसार जो
खुली आंखों से नहीं देख पाते,
हृदय में,
खुशियों से भी ज्यादा खुशियां,
अनुभूतियों से अलग अनुभूतियां,
गहराई से भी अधिक गहरापन,
स्नेह से भी अधिक स्नेह,
अनंत ईश आस्था,
भर जाती है,
मां जब माथा चूमती है!!
सर्वाधिकार अधीन है


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







